मुजफ्फरपुर का वो मुकदमा, जिसने खुदीराम बोस को अमर कर दिया

मुजफ्फरपुर: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में खुदीराम बोस का नाम उस युवा क्रांतिकारी के रूप में दर्ज है, जिसने छोटी उम्र में ही अंग्रेजी शासन को चुनौती देने का रास्ता चुना। 1908 में मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश अधिकारी डगलस किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की घटना के बाद गिरफ्तार हुए खुदीराम ने अंग्रेजी अदालत में मुकदमे का सामना किया और महज 18 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ गए। उनकी शहादत ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे कम उम्र के शहीदों में एक के रूप में अमर कर दिया।

बंगाल के उस किशोर ने क्यों चुनी क्रांति की राह

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को तत्कालीन बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। किशोरावस्था में ही उनका झुकाव राष्ट्रवादी गतिविधियों की ओर बढ़ने लगा था।

1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन तेज हुआ और बंगाल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों को भी बल मिला। भारत सरकार के ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के अभिलेख के अनुसार, खुदीराम करीब 15 वर्ष की उम्र में अनुशीलन समिति से जुड़ गए थे।

उस दौर में युवाओं का एक वर्ग मानता था कि अंग्रेजी शासन को चुनौती देने के लिए सशस्त्र क्रांति भी स्वतंत्रता संघर्ष का एक रास्ता हो सकती है। खुदीराम इसी क्रांतिकारी धारा का हिस्सा बने।

जिस अंग्रेज अधिकारी को निशाना बनाने पहुंचे थे मुजफ्फरपुर

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को ब्रिटिश अधिकारी डगलस किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। किंग्सफोर्ड पहले कलकत्ता में मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट रह चुके थे और बाद में उनका तबादला मुजफ्फरपुर कर दिया गया था।

पढ़ें:  11 अगस्त 1942: पटना में तिरंगे के लिए शहीद हुए 7 छात्र, एक ने फहराया झंडा

दोनों युवा मुजफ्फरपुर पहुंचे और किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखने लगे। उनका उद्देश्य किंग्सफोर्ड को निशाना बनाना था।

प्रफुल्ल चाकी

30 अप्रैल 1908 की वह रात, जब मुजफ्फरपुर दहल उठा

30 अप्रैल 1908 की रात यूरोपियन क्लब से लौट रही एक बग्घी को किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर उस पर बम फेंका गया। लेकिन किंग्सफोर्ड उस बग्घी में नहीं थे। बग्घी में दो ब्रिटिश महिलाएं सवार थीं, जिनकी विस्फोट में मौत हो गई। घटना के बाद मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश प्रशासन ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी।

यह घटना आगे चलकर मुजफ्फरपुर षड्यंत्र मामले के नाम से चर्चित ऐतिहासिक मुकदमे का आधार बनी।

प्रफुल्ल चाकी ने दे दी जान, खुदीराम पकड़े गए

घटना के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। पुलिस दोनों की तलाश में जुट गई।

प्रफुल्ल चाकी पुलिस से घिरने के बाद अपनी जान दे बैठे, जबकि खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया गया। भारत सरकार के अभिलेख के अनुसार, खुदीराम को पकड़ने के बाद उनके खिलाफ मुजफ्फरपुर में मुकदमा शुरू हुआ।

गिरफ्तारी के समय खुदीराम की उम्र केवल 18 वर्ष थी।

खुदीराम बोस अंग्रेज सिपाहियों की गिरफ्त में

21 मई 1908 से शुरू हुआ ऐतिहासिक मुकदमा

खुदीराम बोस के खिलाफ चलने वाला मुकदमा इतिहास में मुजफ्फरपुर षड्यंत्र मामला (Muzaffarpur Conspiracy Case) के नाम से दर्ज है। संस्कृति मंत्रालय के Digital District Repository के अनुसार, इसकी ऐतिहासिक सुनवाई 21 मई 1908 को शुरू हुई और जज कॉर्नडॉफ ने इसकी अध्यक्षता की।

खुदीराम के साथ इस मामले में मृत्युंजय चक्रवर्ती और किशोरीमोहन बंदोपाध्याय के नाम भी जुड़े थे। मुकदमे के दौरान मृत्युंजय की मौत हो गई, जबकि किशोरीमोहन की सुनवाई अलग हुई।

पढ़ें:  गणतंत्र दिवस क्या है और ये 26 जनवरी को क्यों मनाया जाता है? ...जानिए

यह मुकदमा ब्रिटिश शासन के खिलाफ बंगाल और बिहार में बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

इन वकीलों ने अदालत में रखा खुदीराम का पक्ष

खुदीराम बोस के बचाव में भारतीय वकीलों की टीम सामने आई। संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, कालिदास बसु, उपेंद्रनाथ सेन और क्षेत्रनाथ बंदोपाध्याय ने उनकी ओर से पैरवी की। मुकदमे की आगे की कार्यवाही में कुछ अन्य अधिवक्ता भी इस बचाव पक्ष से जुड़े।

खुदीराम के बचाव में उनकी कम उम्र भी महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक थी, लेकिन ब्रिटिश अदालत ने अंततः उन्हें मौत की सजा सुनाई।

अदालत में खुदीराम ने क्या कहा था?

मुकदमे के दौरान खुदीराम का बयान भी दर्ज किया गया। संस्कृति मंत्रालय के अभिलेख के अनुसार, 23 मई 1908 को उन्होंने मजिस्ट्रेट ई.डब्ल्यू. ब्रेडहोड के सामने अपना बयान दोबारा दर्ज कराया।

इस बयान में खुदीराम ने घटना या पूरे अभियान में अपनी भूमिका से इनकार किया था। रिकॉर्ड के अनुसार, बाद में उन्होंने अपने वकीलों के समझाने पर बयान पर हस्ताक्षर किए।

मुकदमा आगे बढ़ा और अंततः ब्रिटिश अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुना दी।

मौत की सजा सुनकर भी चेहरे पर थी मुस्कान

खुदीराम बोस की सबसे चर्चित तस्वीर उनकी शहादत से पहले के उस साहस की है, जिसे कई ऐतिहासिक विवरणों में दर्ज किया गया है।

संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, जब जज ने उन्हें मौत की सजा सुनाई, तो महज 18 साल के खुदीराम मुस्कुरा दिए। उनके इस व्यवहार ने अदालत को भी हैरान कर दिया। अगले दिन Amrita Bazar Patrika ने उनकी मौत की खबर को “Khudiram’s End: Died cheerful and smiling” शीर्षक के साथ प्रकाशित किया था।

पढ़ें:  15 अगस्त को ही क्यों मनाते हैं स्वतंत्रता दिवस? जानिए इसके पीछे की असली वजह

यही मुस्कान आगे चलकर खुदीराम बोस की निर्भीकता और बलिदान की सबसे यादगार पहचान बन गई।

जज से बम बनाने की बात कही थी? जानिए क्या है इतिहास

खुदीराम बोस से जुड़ा एक बेहद चर्चित प्रसंग उनके और जज के बीच कथित बातचीत का है। लोकप्रिय ऐतिहासिक विवरणों में कहा जाता है कि मौत की सजा सुनाए जाने के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें सजा का अर्थ समझ में आया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर उन्हें थोड़ा समय दिया जाए तो वह जज को भी बम बनाना सिखा सकते हैं।

यह प्रसंग खुदीराम की निर्भीकता से जुड़ी लोकप्रिय कथा बन चुका है और कई लेखों में इसका उल्लेख मिलता है। हालांकि, उपलब्ध सरकारी Digital District Repository में इस संवाद का शब्दशः अदालत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित अदालत-उद्धरण के बजाय प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।

11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर में दी गई फांसी

मौत की सजा के बाद खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर में फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र केवल 18 वर्ष थी। भारत सरकार के अभिलेखों में उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे कम उम्र के शहीदों में शामिल किया गया है। बाद के सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक अभिलेखों में भी फांसी के समय उनके चेहरे पर मुस्कान का उल्लेख मिलता है।

रोहित, WireKhabar के संस्थापक एवं लेखक हैं। वे गहन शोध, विश्वसनीय स्रोतों और तथ्यों के आधार पर विस्तृत फीचर एवं व्याख्यात्मक (एक्सप्लेनर) लेख लिखते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों को किसी विषय की स्पष्ट, संदर्भपूर्ण और उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि हर लेख केवल जानकारी न दे, बल्कि विषय को गहराई से समझने में भी मदद करे।