सावन में बिहार के प्रसिद्ध शिव धाम, जानें क्या है खास

सावन आते ही बिहार के शिव मंदिरों में आस्था का रंग और गहरा हो जाता है। गंगा के घाटों से निकलती कांवर यात्राओं से लेकर पहाड़ों और गुफाओं में बसे प्राचीन शिव धामों तक, हर जगह भोलेनाथ के जयकारे सुनाई देते हैं। राज्य के इन मंदिरों की अपनी अलग पहचान है—कहीं एक ही प्रतिमा में हरि और हर विराजते हैं, कहीं महादेव और महाकवि विद्यापति की कथा जुड़ी है, तो कहीं गुफा तक पहुंचना ही श्रद्धालुओं के लिए कठिन यात्रा बन जाता है।

जहां एक ही प्रतिमा में विराजते हैं ‘हरि’ और ‘हर’

सारण के सोनपुर में स्थित हरिहरनाथ मंदिर बिहार के प्रमुख शिव तीर्थों में शामिल है। मंदिर की सबसे खास पहचान भगवान शिव यानी ‘हर’ और भगवान विष्णु यानी ‘हरि’ की संयुक्त उपासना है। इसी वजह से इसे हरिहरनाथ कहा जाता है।

गंगा और गंडक के संगम क्षेत्र के पास स्थित इस मंदिर में सावन के दौरान जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले सोनपुर मेले के दौरान भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं और स्नान के बाद हरिहरनाथ के दर्शन करते हैं।

बिहार का ‘देवघर’, जहां सावन में गूंजता है बोल-बम

मुजफ्फरपुर शहर के बीच स्थित बाबा गरीबनाथ धाम सावन में उत्तर बिहार के प्रमुख शिव स्थलों में शामिल हो जाता है। श्रद्धालुओं के बीच इसे बिहार का ‘देवघर’ भी कहा जाता है।

सावन में कांवरिये गंगाजल लेकर पैदल बाबा गरीबनाथ के दरबार पहुंचते हैं। पहलेजा घाट समेत विभिन्न गंगाघाटों से जल लेकर आने वाले श्रद्धालुओं के कारण इस दौरान मुजफ्फरपुर में कांवरियों की चहल-पहल बढ़ जाती है।

पूरे सावन मंदिर में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता है। सावन के सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ जाती है।

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बाबा बैद्यनाथ धाम की 105 किमी कांवर यात्रा यहीं से शुरू होती है

भागलपुर के सुल्तानगंज में गंगा किनारे स्थित अजगैवीनाथ मंदिर श्रावणी कांवर यात्रा का प्रमुख केंद्र है। चट्टानी भूभाग पर बने इस प्राचीन मंदिर की पत्थरों पर बनी नक्काशी और शिलालेख इसकी खास पहचान हैं।

कांवरिये सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरते हैं और बाबा अजगैवीनाथ के दर्शन के बाद देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए पैदल निकलते हैं। सुल्तानगंज से देवघर तक कांवर यात्रा का मार्ग करीब 105 किलोमीटर लंबा है।

श्रावणी मेले के दौरान बिहार के अलावा दूसरे राज्यों और नेपाल से भी श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं।

जहां भगवान राम के जन्म से जुड़ी है पुत्रेष्टि यज्ञ की मान्यता

मधेपुरा का सिंहेश्वरनाथ धाम प्राचीन शिव मंदिर और रामायणकालीन धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां की मान्यता महर्षि श्रृंगी से जुड़ी है।

कहा जाता है कि राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि श्रृंगी की देखरेख में पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। धार्मिक परंपरा में इसी यज्ञ के बाद भगवान राम समेत चारों भाइयों के जन्म की कथा जुड़ी है।

सावन में सिंहेश्वरनाथ मंदिर में जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

मिथिलांचल का वह शिव धाम, जहां सर्दियों में आते हैं प्रवासी पक्षी

दरभंगा जिले का कुशेश्वरस्थान धार्मिक आस्था के साथ अपनी प्राकृतिक विशेषताओं के लिए भी जाना जाता है। यहां स्थित प्राचीन शिव मंदिर प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है।

मंदिर के आसपास की आर्द्रभूमि सर्दियों में प्रवासी पक्षियों का ठिकाना बनती है। अलग-अलग प्रजातियों के पक्षियों के पहुंचने के कारण यह क्षेत्र धार्मिक यात्रियों के साथ पक्षी प्रेमियों को भी आकर्षित करता है।

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स्थानीय धार्मिक मान्यता में कुशेश्वरस्थान को भगवान राम के पुत्र कुश से जुड़ी कथा के साथ भी जोड़ा जाता है।

जहां महादेव बन गए थे महाकवि विद्यापति के सेवक

मधुबनी के भवानीपुर गांव स्थित उगना महादेव मंदिर की पहचान महाकवि विद्यापति और भगवान शिव से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथा से है।

मान्यता है कि भगवान शिव विद्यापति की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके सेवक के रूप में उनके साथ रहने लगे थे। उनका नाम ‘उगना’ बताया गया। कथा के अनुसार, एक अवसर पर उगना ने विद्यापति को गंगाजल पिलाया और बाद में उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का पता चला।

मिथिला की धार्मिक और साहित्यिक परंपरा में विद्यापति और उगना महादेव की यह कथा आज भी विशेष स्थान रखती है।

बिहार का ‘केदारनाथ’, जहां गुफा के भीतर विराजते हैं भोलेनाथ

रोहतास का गुप्ताधाम बिहार के अनोखे शिव तीर्थों में शामिल है। पहाड़ी क्षेत्र में स्थित गुफा के भीतर शिवलिंग होने के कारण यहां पहुंचना अपने आप में एक अलग धार्मिक यात्रा है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव इसी गुफा में आकर छिपे थे। इसी कथा से इस स्थान के ‘गुप्ताधाम’ नाम की मान्यता जुड़ी है।

सावन में कठिन पहाड़ी रास्ते के बावजूद बड़ी संख्या में शिवभक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

जहां सहस्रलिंगी महादेव के होते हैं दर्शन

गया जिले का बाबा कोटेश्वरनाथ धाम प्राचीन शिव उपासना का प्रमुख केंद्र है। यहां सहस्रलिंगी महादेव की मान्यता इस धाम की खास पहचान है।

मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन पीपल का पेड़ भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। कोटेश्वर स्थान धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थल है और महाशिवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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जहां एक शिवलिंग पर उकेरे गए हैं 108 छोटे शिवलिंग

पटना के पास बैकटपुर गांव स्थित श्री गौरीशंकर बैकुंठधाम अपने अनोखे शिवलिंग स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव के साथ माता पार्वती की उपस्थिति वाली शिवलिंग संरचना श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मुख्य शिवलिंग पर 108 छोटे-छोटे शिवलिंग भी बने हुए हैं। सावन में पटना और आसपास के इलाकों से श्रद्धालु यहां जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

जहां पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन को नेपाल से भी आते हैं भक्त

पूर्वी चंपारण के अरेराज में स्थित सोमेश्वरनाथ धाम सावन के प्रमुख शिव स्थलों में शामिल है। मोतिहारी से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में पंचमुखी शिवलिंग की मान्यता है।

श्रावणी मेले के दौरान बिहार के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। नेपाल से आने वाले भक्तों की भी बड़ी संख्या रहती है। मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध राजा सोम से माना जाता है और मंदिर की ऊंचाई करीब 55 फीट बताई जाती है।

जहां करीब छह सदियों से अखंड धुनी की मान्यता

औरंगाबाद के बाबा दूधेश्वरनाथ मंदिर में सावन और महाशिवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इन अवसरों पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में इसकी स्थापना भगवान राम से जोड़ी जाती है। इस क्षेत्र को महर्षि च्यवन की तपोभूमि से जोड़ने वाली परंपरा भी प्रचलित है। मंदिर परिसर में अखंड धुनी जलने की मान्यता है, जिसे स्थानीय परंपरा में करीब छह सौ वर्ष पुराना बताया जाता है।