बिहार के बगहा के बनकटवा में एक ऐसा मंदिर स्थित है, जहां लोगों का मानना है कि साक्षात नारायण वास करते हैं। हम बात कर रहे हैं श्री बाबा विश्वंभर नाथ मंदिर की। यहां पर शालिग्राम महाराज स्थापित हैं, जिन्हें लोग भगवान विष्णु के रूप में पूजते हैं। इन्हें श्री बाबा विश्वंभर नाथ के नाम से जाना जाता है। मंदिर में स्थापित शालिग्राम का आकार लगभग 168 वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। कभी लोगों ने शालिग्राम पत्थर को एक मटर के दाने की साइज में देखा था। आज इसका आकार इतना बड़ा हो गया है कि आसन बदलने में इसे उठाने के लिए 4-5 लोगों को जुटना पड़ता है।
भगवान विष्णु का कच्छप अवतार
श्री बाबा विशंभर नाथ (शालिग्राम) को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। शालिग्राम भगवान विष्णु का एक प्राकृतिक जीवाश्म पत्थर है और इसे भगवान का एक दिव्य रूप माना जाता है। इस मंदिर का शालिग्राम विशेष रूप से कच्छप अवतार (कछुए के आकार) में स्थापित है, जो विष्णु भगवान के चौबीस अवतारों में से एक है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कच्छप अर्थात कछुआ रूप धारण किया था, जिसने मंदार पर्वत को समुद्र के ऊपर रखा था। इस कच्छप अवतार का प्रतीक यह शालिग्राम इस मंदिर में विराजमान है। श्रद्धालुओं के अनुसार, इसमें शालिग्रामजी का साक्षात वास है। इसीलिए इसके आकार में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह मंदिर काफी पुराना है और दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। शालिग्राम के भारत आने की कथा भी रोचक है। लोगों के लिए यह किसी रहस्य से कम नहीं है।
नेपाल के राजा से मिली थी सौगात
स्थानीय लोगों के अनुसार, 1857 में क्रांति के समय नेपाल के राजा जंग बहादुर सीवान गए थे। वहां से लौटते वक्त वो बगहा पहुंचे तो यहां के हलुवाई रामजीआवन भगत ने राजा का स्वागत बड़े धूमधाम से किया। रामजीआवन ने एक मंदिर बनाया था। राजा उनके स्वागत से खुश हो गए और उनके बुलावे पर मंदिर परिसर में गए। जहां पर उन्होंने रामजीआवन भगत को नेपाल आने का आमंत्रण दिया।

रामजीआवन भगत नेपाल गए तो वहां के राजपुरोहित ने राजा की ओर से उन्हें मटर के आकार जितना एक शालिग्राम भेंट किया। रामजीआवन भगत उसे लेकर भारत आए और यहां मंदिर में स्थापित कर दिया। इस बात को करीब 167 वर्ष हो गए हैं। तब से लेकर आज तक शालिग्राम का आकार बढ़ता ही जा रहा है। माना जाता है कि हर साल यह लगभग तिल के बराबर आकार में बढ़ता है, और जन्माष्टमी के मौके पर एक नया शालिग्राम इसके अंदर उत्पन्न होता है। आज इस मंदिर को श्री बाबा विश्वंभर नाथ के नाम से जाना जाता है।
साल में एक बार जन्माष्टमी के दिन बदला जाता है आसन
हर वर्ष जन्माष्टमी के दिन शालिग्राम को उसके आसन से उतारा जाता है और पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पहले भगवान का आकार छोटा था, इसलिए स्नान आसानी से कराया जाता था, लेकिन अब आकार इतना बढ़ गया है कि पांच से छह पुजारी मिलकर ही इसे उठाते हैं। इसके साथ ही, कार्तिक पूर्णिमा (देवउठनी एकादशी) पर माता तुलसी और भगवान विष्णु का विवाहोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, पूरे शहर में भव्य बारात निकलती है। भक्तगण बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ यहाँ दर्शन करने और मनोकामनाएं पूरी करने हेतु आते हैं।
यहां है एक पोखर
इस मंदिर के ठीक पीछे एक पोखर है, जिसे लोग पक्की बावली कहते हैं। ऐसा लोग बताते हैं कि इस पोखर से गंडक नदी का तार जुड़ा हुआ है। आज तक यह पोखरा कभी नहीं सूखा है। यह बावली के किनारे स्थित मंदिर में विराजमान है।
तीन समय सूरज की रोशनी पड़ती है इनके ऊपर
बाबा विशंभर नाथ तक पहुंचने के लिए 8 गेट बनाए गए हैं। यह मंदिर चारों तरफ से ढका हुआ है। इसके बावजूद मंदिर में विराजमान बाबा विशंभर नाथ पर पूरे दिन में तीन बार सूरज की रोशनी पहुंचती है।
नहीं बोलता कोई भी झूठ यहां
इस मंदिर के प्रांगण में कोई भी झूठ नहीं बोलता है। लोगों की मान्यता है कि जब भी इस मंदिर में कोई झूठ बोला है तो उसके साथ अनहोनी हुई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि जब भी कोई पंचायत होती है तो इसी के प्रांगण में है और यहां आने पर कोई भी झूठ नहीं बोलता है।






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